गेम की लत से गई गाजियाबाद की तीन बहनों की जान? डॉक्टर ने पैरेंट्स को दी ये सलाह

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गाजियाबाद ट्रिपल सुसाइड केस के बाद मनोचिकित्सक डॉ. आशीष बंसल ने बताया कि लेवल-बेस्ड ऑनलाइन गेम्स बच्चों के दिमाग पर गहरा असर डालते हैं और डोपामाइन के कारण डिजिटल डिपेंडेंसी बढ़ती है. मोबाइल अब बच्चों की सोशल पहचान बन गया है, जिससे वे असली दुनिया से कट रहे हैं. हर 10 में से 2 बच्चे गेमिंग एडिक्शन से प्रभावित बताए गए हैं. डॉक्टर ने डिजिटल बाउंड्री, नो-फोन जोन, फैमिली टाइम और हॉबी आधारित सब्स्टीट्यूशन को जरूरी समाधान बताया.

गाजियाबाद की तीन बहनों की गेम एडिक्शन के कारण हुई आत्महत्या ने न सिर्फ एनसीआर, बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. इस मामले को लेकर आज तक ने मनोचिकित्सक डॉ. आशीष बंसल (MD Psychiatry) से बातचीत की. उन्होंने बताया कि किस तरह लेवल-बेस्ड ऑनलाइन गेम्स बच्चों के दिमाग पर गहरा असर डालते हैं. इन खेलों के दौरान डोपामाइन का स्तर बढ़ता है, जिससे बच्चे धीरे-धीरे इन पर निर्भर हो जाते हैं.

आज के समय में मोबाइल फोन बच्चों के लिए एक सोशल आइडेंटिटी का जरिया बन चुका है, जो उनकी मानसिक सेहत को प्रभावित कर रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर 10 में से 2 बच्चे ऑनलाइन गेमिंग एडिक्शन का शिकार हैं. डॉ. बंसल ने बताया कि माता-पिता किस तरह डिजिटल बाउंड्रीज तय करके बच्चों को फोन एडिक्शन से बचा सकते हैं. उन्होंने मोबाइल और सोशल मीडिया की लत से जुड़ी पूरी कहानी विस्तार से साझा की.

डॉक्टर ने बताया, आज के समय में मोबाइल फोन Teenagers के लिए सिर्फ एक गैजेट नहीं, बल्कि उनकी सोशल पहचान बन चुका है. बड़ों के साथ-साथ बच्चों के लिए भी फोन जरूरी माना जाने लगा है. लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब डिजिटल कनेक्शन उन्हें असली दुनिया से डिस्कनेक्ट करने लगता है. 

डोपामाइन केमिकल करता है काम

डॉक्टर के अनुसार इसे “ब्रेन हाइजैकिंग” के रूप में समझा जा सकता है. हमारे दिमाग में डोपामाइन नाम का केमिकल होता है, जो मोटिवेशन और खुशी से जुड़ा है. बचपन में अच्छे नंबर लाने पर मिलने वाले इनाम से जो खुशी मिलती है, वह भी डोपामाइन से जुड़ी होती है. इसी तरह जब बच्चा बार-बार मोबाइल स्क्रीन देखता है या गेम खेलता है, तो दिमाग को लगातार डोपामाइन की हिट मिलती है और इसकी आदत पड़ जाती है.

धीरे-धीरे सामान्य खुशियां जैसे दोस्तों से मिलना, परिवार से बात करना, पार्क में जाना या साइकिल चलाना भी बोरिंग लगने लगता है. Teenagers को इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन सिर्फ स्क्रीन से मिलने लगता है. व्यस्त जीवन, न्यूक्लियर फैमिली और दोनों पेरेंट्स के कामकाजी होने से बच्चों का स्क्रीन टाइम और बढ़ रहा है.

कब आता है डिजिटल डिपेंडेंसी के रेड फ्लैग का सिग्नल?

डॉक्टर ने बताया कि अगर बच्चा फोन हटाने पर गुस्सा करता है, आक्रामक हो जाता है, नींद का चक्र बिगड़ गया है या खाना खाते समय भी स्क्रीन से नजर नहीं हटाता, तो ये डिजिटल डिपेंडेंसी के रेड फ्लैग संकेत हैं. इसके लक्षण नशे की लत जैसे ही होते हैं. यह एडिक्शन तंबाकू या शराब की लत के बराबर असर डाल सकता है.

Teenagers का ब्रेन डेवलपिंग स्टेज में होता है. फ्रंटल लोब, जो फैसले लेने, फोकस और अटेंशन के लिए जिम्मेदार है, ज्यादा स्क्रीन टाइम से धीमा विकसित हो सकता है. इसके नतीजे में अटेंशन की कमी, चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ती है.

लेवल-बेस्ड और टास्क-बेस्ड गेम्स दिमाग पर ज्यादा असर डालते हैं. जैसे-जैसे लेवल बढ़ता है, रिवार्ड और रिकॉग्निशन बढ़ता है. यह ठीक वैसे ही है जैसे ज्यादा नंबर पर बड़ा इनाम मिलता है. गेम में यह इनाम सोशल रिकॉग्निशन और प्रोफाइल ग्रोथ के रूप में मिलता है, जिससे डिपेंडेंसी और बढ़ती है और डोपामाइन रिलीज का चक्र तेज होता जाता है.

क्या है समाधान?

समाधान के तौर पर डॉक्टर ने डिजिटल बाउंड्री बनाने की सलाह दी. जैसे डाइनिंग टेबल और बेडरूम को नो-फोन जोन बनाना, सोने से एक घंटा पहले फोन बंद करना, और बच्चों के साथ क्वालिटी फैमिली टाइम बिताना. फोन छीनना समाधान नहीं, बल्कि सब्स्टीट्यूशन जरूरी है, खेल, संगीत और अन्य हॉबी की ओर मोटिवेट करना होगा.

डॉक्टर ने कहा, हम बच्चों को डिजिटल दुनिया में भेज रहे हैं, लेकिन डिजिटल मैनर्स सिखाना भूल रहे हैं. बदलाव की शुरुआत घर के बड़ों से ही करनी होगी.

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